श्रीमद् भगवद् गीता की 50 श्रेष्ठ बातें :
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कर्म करो, फल की चिंता मत करो।
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जो हुआ, अच्छा हुआ। जो हो रहा है, अच्छा हो रहा है।
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जीवन में संतुलन ज़रूरी है।
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मन को नियंत्रित करना सबसे बड़ी विजय है।
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क्रोध से विनाश होता है।
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इच्छा ही दुख का कारण है।
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जो कुछ भी होता है, वह उचित कारण से होता है।
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आत्मा अमर है, शरीर नश्वर है।
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सच्चा भक्त सब में भगवान को देखता है।
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आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा बल है।
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दूसरों की भलाई में ही अपनी भलाई है।
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मनुष्य अपने विचारों से ही ऊपर उठता या गिरता है।
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अपने कर्तव्य को अधूरा करना, दूसरों के कर्तव्य को पूरा करने से बेहतर है।
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सफलता का आधार मेहनत है।
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भय से बचो, डर से हानि होती है।
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ज्ञान विनम्रता से आता है।
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शिकायतें मन का बोझ हैं।
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गुरु के बिना ज्ञान अधूरा है।
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हर व्यक्ति अपने कर्म से महान बनता है।
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दुख और सुख एक समान हैं।
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हर कठिनाई हमें कुछ सिखाने आती है।
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सच्चा ज्ञान भीतर से आता है।
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जो स्वयं को जीत लेता है, वही दुनिया को जीतता है।
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परिवर्तन ही दुनिया का नियम है।
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बहादुर वही है जो कठिनाइयों का सामना करता है।
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दूसरों की कमज़ोरियों पर नहीं, अपनी शक्ति पर ध्यान दो।
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सेवा ही सच्ची पूजा है।
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क्रोध और लोभ से दूर रहो।
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अपने मन को शांत रखो, निर्णय सही होगा।
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सत्य हमेशा विजयी होता है।
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जो दुर्गुणों को छोड़ देता है, वह मुक्त हो जाता है।
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परमात्मा हर जगह है, हर किसी में है।
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विनम्रता महानता का प्रतीक है।
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असफलता, सफलता की सीढ़ी है।
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हर कार्य से पहले सोचो, फिर करो।
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भक्ति, ज्ञान और कर्म – ये तीन मार्ग मोक्ष के हैं।
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मन को शांत करने का प्रयास ही ध्यान है।
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दोस्ती और शत्रुता दोनों मन में हैं।
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हर स्थिति में धैर्य रखो।
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काम, क्रोध, लोभ – ये तीन ही दुख के मूल हैं।
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अपने भीतर झांकना सीखो।
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दुनिया बदलने से पहले स्वयं को बदलो।
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जो देता है, वही पाता है।
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मनुष्य अपने कर्मों से ही बना है।
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अच्छाई फैलाओ, बुराई मिट जाएगी।
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आत्मा जन्म नहीं लेती, मृत्यु नहीं पाती।
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भगवान की शरण में जाने से डर खत्म होता है।
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जीवन एक युद्ध है, पर शांति से लड़ो।
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स्वार्थ छोड़कर परोपकार करो, संतोष मिलेगा।
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भगवद् गीता जीवन का मार्गदर्शन है – इसे पढ़ो, समझो और अपनाओ।